Wednesday, 23 November 2016

विरोधाभास



ओ री बरखा
रात भर तू नीर बहाती रही
नेह का मीठा जल बरसाती रही
भीगा तन पुलकित हुआ मन
गीली माटी से धुल गए
धुंधली यादों के सब निशाँ
खिल गयी वादियाँ
मिट गए सब संशय
उजला हुआ जहान
ओ री बरखा
ये मोरी अखियाँ भी तो
रात भर नीर ही हैं बहाई
कजरारे नैनों से झरती
नमकीन काली लकीरों से
कपोल-अधरों से लेकर
मन तक सब कलुषित..
यादें न मिट सकेंगी
इस जल से भी उसकी
चीख पुकार ले 'नीलपरी',
चाहे तू पहरों रो ले
मिल गया, उफ्फ्फ़!
आज यह नया संज्ञान
ओ री बरखा
यह भी जल, वह भी जल
इक मीठा, अमृत बरसाता
इक तेज़ाबी, अंतस तक जलाता
इक आज के प्रेम की ठंडी फुहार
इक अतीत के प्रेत के साये सा लहराता
पर हैं तो जल ही न...
फिर क्यूँ ये विरोधाभास, सखी री !!
फिर क्यूँ ये विरोधाभास.....???