Wednesday, 15 January 2020

तुम्हारी यादें


तुम्हारी यादें
क्लियोपैट्रा का हमाम
दूध के टब में
गुलाब की पंखुड़ियों का पैगाम

तुम्हारी यादें
एसटी लॉडर की स्लिम सी
इत्र की बोतल का
बस महकता सा गुलफाम

तुम्हारी यादें
ओल्ड मॉन्क की
चालीस बरस रखी रम का
आह बहकता सा शबाब

तुम्हारी यादें
बंद दरीचों से आती
छुपती शर्माती जिस्म को गरमाती
कुनकुनाती धूप का सलाम

तुम्हारी यादें
इमली से खट्टा गुड़ से मीठा
बिना ज़र्दे, बिना चूने का
मीठा वाला बनारसी पान

तुम्हारी यादें
ओस की चंद बूंदों पर
नरम उंगली के कंपकपाते पोरों से
उकेरा प्रेम का स्वीट नाम

तुम्हारी यादें
उफ़्फ़फ़ और क्या उपमा
क्या उपमान दूँ अब 'नीलपरी'
चांदनी रात में नहाया दूधिया ताज