Wednesday, 24 May 2017

फ़ीनिक्स सी ज़िन्दगी


अज़ाब सी ज़िन्दगी
खा ली,
अपनी उम्र बराबर
प्रोज़ाक की छोटी गोलियां
20 मिलीग्राम की
नींद के आगोश में
शून्य के चरम तक पहुँचने की
फिर एक नाकाम कोशिश
समय को विराम देने की
भरसक जद्दोजहद में
टूटी-बिखरी
बिखर के उलझी
उलझ के सुलझी
कितनी ही बार राख हुई
फिर अपनी ही राख से जी उठी
फ़ीनिक्स सी ज़िन्दगी
क्योंकि वो एक जिस्म नहीं 'नीलपरी'
एक माँ थी..



Sunday, 21 May 2017

याद

कह दो उससे
याद आती तो है
कभी कभार उसकी
पर अब नहीं बनते
वो पारदर्शी
नमकीन बुलबुले
नीली आँखों के कोर..
अब नहीं धड़कता दिल
सुनके उसका नाम
दिल मचलता तो है
पहनने को उसका दिया
जयपुरी नीला सूट और
उससे मैच करते
चांदी के बूंदे
पर ज़िद नहीं करता..
रात आती तो है अब भी
पर नहीं जाते अब
हम और तुम
ख्वाब में भी
डल झील के उस पार..
सूख गए बौगैनविल्ला
गुडहल जो बोये थे
हमने संग संग
बंद कर दिए मँगाने
फूलवाले से भी फूल
मुरझा जो गए उसके दिए
हर रंग के नायाब गुलाब..
हाँ कह दो उससे
कैनवास पे चेहरे नहीं
अब बनते हैं हमसे
सूरज चाँद और तारे..
अब क्यूं सताएगी
तनहा रात हमें
करती है न वो हमसे
कहानी भोर तलक....

घरौंदा

न जाने मन में
क्या आई उस रोज़
चाक मिटटी से
बनाते हुए मूरत
बना लिया
सीली मिट्टी का
छोटा सा
घरौंदा भी
सोचा रचाऐंगे
बचपन जैसा
गुड्डा गुड़िया का
ब्याह फिर से...
शायद अब तलक
बचपना था मुझ में
नासमझ थी
नादान भी
छोड़ दिया वो
प्रेम का खिलौना
सुखाने तेज़ धूप...
गमों की चली आंधी
बरखा नीर बहाए
टूट गया
बह गया
सपनों वाले प्रेम का
छोटा सा वो आशियां...

एक्सपायरी डेट

वो कहते हैं
वो सच ही तो कहते हैं
जिस्म मरता है
रूह नहीं मरती
रूह तो,
अजर है
अमर है
जिस्म की उम्र होती है
बोतल पर लिखी
एक्सपायरी पढ़ते हो न
ऐसी ही एक्सपायरी डेट के साथ
आता है इक इक जिस्म
या के फिर मैन्युफैक्चर होता है
खुशियाँ मनाते हो न
हर बर्थडे
ऐसे ही मनाना तुम
खुशियाँ
एक्सपायरी एनिवर्सरी पर भी
और करना इंतज़ार
रूह का मेरी
क्योंकि
आऊँगी न फिर फिर
पहन नया चोला
अगले,
फिर उससे अगले जन्म,
हर जन्म
तुम्हारी
सिर्फ तुम्हारी
परी बनकर
पहचानना होगा तुमको
मेरी पलकों से छुपी
आँखों की गहराई में उतर
तलाशना होगा अपना अक्स
क्योंकि
वो कहते हैं न
शरीर बदलता है
पर आँखें नहीं बदलती
एक प्रेममयी रूह

चन्ना


आहें जब खलवत से टकराती हैं
नीले अक्सों के साए से
            तेरी तस्वीर उभर कर आती है
अश्कों का साथ लेकर
             यादों की बारात सी बन जाती है
चंद लरजते साये से
             रह रह के दिल को जलाते हैं
           
आहें जब खलवत से टकराती हैं
 मौन के रुंधे गले से
              रुलाई सी फूट जाती है
गालों को छूता, लटों में उलझता
              इक तन्हा सा कजलाया मोती
होठों पे लुढ़कना चाहता है
             ओ बेदर्दी, याद तेरी दिलाता है

आहें जब खलवत से टकराती हैं
हर निशा अमावस सी हो जाती है
           पगलाई सी तारों से बतियाती हूँ
हंसिए सा चन्दा अट्टारी पे
            जिगर के पार उतरना चाहता है
कलेजे को थामे, धड़कन को रोके
           तेरे क़दमों की आहट को तरसती हूँ

ओ चन्ना मेरिया अब तो आजा
     ये तन्हाई नागिन सी, मुझे डसने को आतुर होती है


* खलवत- एकांत
         

         

खुद से परिचय

सोलह बरस की अनचाही
           अंधियारी कैद से रिहाई की
चलो आज वर्षगाँठ मनाई जाए
            पैंतालीस की उम्र में 'नीलपरी'
खुद से खुद का, आज परिचय कराया जाए

नटखट, चंचल तितली सी उड़ती
            रंग बिरंगे पंखों सी, नीली-गुलाबी फ्रॉक
देखो छोटी गोलमटोल, हाथ में लॉलीपॉप
           बेटी सी कोमलता, बेटे जैसे काम जो करे
मासूम परी से आज परिचय किया जाए

पढ़ने में अव्वल, गोल्डमेडल जीते अनेक
            कंप्यूटर की नौकरी,पेंटिंग का है शौक
माँ-पापा की शान, मोहल्ले भर की दुलारी
            पराई हुई, दुल्हन बनी फ़ूली न समायी
सुलक्षणा परी से आज परिचय किया जाए

सलोने सपन संजोये, दरिंदगी लिखी लकीरों में
            घर-नौकरी-रुपयों का गणित अकेली करे
हैवानियत से नित्य वो अपनी दुर्गत बनवाये
            अपनों से कोख बचाने खातिर रोबोट बनी
वन-मैन-आर्मी परी से आज परिचय किया जाए

जल बिन मछली की तड़प कौन है समझा
            गिरते हौंसले बुलंद, ले साईं का नाम
महलों को ठोकर मारी, नहीं उसे कोई गम
            प्रगतिपथ पर उड़ी मासूमियत ले संग
दृढ़निश्चयी-धैर्यशील परी से परिचय किया जाए

चलो पैंतालीस की उम्र में 'नीलपरी'
      खुद से खुद का, आज परिचय कराया जाए

Monday, 13 March 2017

प्रीत की होली


प्रीत की होली परी, तुझ संग खेली कान्हा..
प्रीत की होली परी, तुझ संग खेली कान्हा..

जीवन गलियां सूखी, मेरी अखियाँ रूखी
तुझ बिन ओ कान्हा मेरी, सब रतियाँ रूठी
प्रीत की होली परी, तुझ संग खेली कान्हा.. 

जब से तेरा रंग चढ़ा, सब रंग मुझे फीके लगें
तन-मन श्वेत-पावन हो, सब रंग निखरे लागें
प्रीत की होली परी, तुझ संग खेली कान्हा..

प्रीत रंग में ऐसी रंगी मैं, जोगन बन बन नाचूँ
लोग कहें बाँवरी मुझे, कान्हा मैं तेरी राधा कहाऊँ
प्रीत की होली परी, तुझ संग खेली कान्हा..

मस्त मगन, जिया धड़क धड़क, ओ कान्हा
जिया जाए न जाए न तेरे बिन, ओ रे कान्हा
प्रीत की होली परी, तुझ संग खेली कान्हा..

आज फिर दिल ये चाहे, आकर तू मोहे अंग लगाये
होली तेरी-मेरी प्रीत की, और कोई न होली होये
प्रीत की होली परी, तुझ संग खेली कान्हा..



Monday, 13 February 2017

Kiss Day


अनुरागी दिल की मधुर पुकार
तुझ पर हों मेरे मन प्राण निसार
मिट कर राग द्वेष निर्मल हो उर
तुम जो पुकार लो इक बार...

मन वीणा के बज उठते सब तार
झूम झूम नाच उठती मस्त बयार
दिल गा उठता फिर-फिर मल्हार
तुम जो हंस दो इक बार...

चन्द्र मुख तेरा मद का प्याला
श्वास श्वास में जीवन भर डाला
निर्झरणी बने ओ साकी हाला
बाँहों में जो ले लो मुझे इक बार...

खुशियों की मस्त फुहार पुष्पित
रोम रोम में मेरे चन्दन सुवासित
मधुशाला सा हिया होगा पुलकित
कचनार का रसपान जो करो इक बार...

मधुर रसमयी हुआ मेरा संसार
स्वर्ग की फिर क्यूँ करूँ दरकार
बन जाओ जो तुम मेरे इक बार
बन जाओ सनम, मेरे, अब की बार...

Tuesday, 7 February 2017

हैप्पी प्रपोज़ डे


कुछ शायराना सा
कुछ आशिकाना हुआ
जवां मौसम आज
ढूब पर नंगे पाँव सा
तुझे याद करता हुआ
धड़के मोरा हिवड़ा आज
बरखा की रिमझिम सा
थोड़ा रूमानी हुआ
बच्चा सा दिल भी आज
बूंदों की लड़ी में उजला सा
कुछ खिलखिलाता हुआ
मचला तेरा अक्स आज
प्रेम का अंकुर छुटका सा
तेरे नाम की पींगें बढ़ाता हुआ
मोर बनके नाचे आज
:
याद है तुम्हारा 
मुझसे वो प्रथम
प्रणय निवेदन....
तुम्हारे बढे हाथ पे रखकर हाथ
थोडा लजाकर, थोडा शरमाकर,
'यस आई डू' कहा था मैंने,
आज जब तुम कहते हो
हर दिन ही तो वही फीलिंग्स
हर दिन प्रेम, तो ये सब क्यों परी...
तो सुनो सनम,
सब तो मना रहे ये वैलेंटाइन वीक
मैं ही बचपना क्यों छोड़ दूँ?
तुम न कहो,
मैं ही पूछती हूँ,
घुटनों के बल बैठ
'विल यू बी माइन फोरएवर?'
कहो न
सुन रही हूँ मैं.... 💕

हैप्पी रोज़ डे

वो कहते हैं हमसे
ओ परी.....!!
मेरे ख्वाबो में
तुम आती हो 
लब कुछ नहीं कहते
पर अक्सर...
मेरी तनहा रातों में 
तुम्हारी खामोशी भी 
गुनगुनाती है ...
तुम्हारे गुलाबी होंठ
जो दिन में 
कुछ न कह पाए 
नीले, चंचल नैना तोरे
मेरे सीने में बाण 
सा चलाते हैं ...
नीले आकाश तले 
आ देख, चाँद तारों ने
डोली तेरी सजाई है 
अब आ जा नीलपरी 
नीला जोड़ा पहने ..
कि कमसिन गुलाबों से 
अपने अहसास भर भर
अपने अरमानों की 
मैंने सेज आज सजाई है ...

और दूर fm पर गाना सुनाई दिया....
ख्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त कौन हो तुम बतलाओ... देर से कितनी दूर खड़ी हो और करीब आ जाओ...!!

Happy rose day🌷💕🌷

Tuesday, 31 January 2017

तेरी मेरी प्रेम कहानी


इक सुरमयी सर्द सी साँझ
यूँ ही ख्यालों को गूँधती
बेला चमेली की खुशबु में
तेरी महक को तलाशती
यादों के पिटारे से
कुछ मचलते पलों को चुनती
धड़कनों के ताप पर पकाती
तेरे इश्क़ की चांदनी में बहकती
तेरी नज़रों की तपिश से
अपना ही अक्स निहारती
खुद पे इतराती
थोड़ा लज्जाती, थोड़ा शर्माती
यादों वाली तारकों की चुनरी में
कुछ नए एहसास टांकती
मिलन से जुदाई
जुदाई से मिलन के
लम्हों ही लम्हों की
दूरी को नापती
इंतज़ार के स्याह पलों को बाँचती
तुझे सुनाने को गढ़ ही देती हूँ
इक नई प्रेम कहानी
तेरी-मेरी......

Wednesday, 25 January 2017

गणतंत्र दिवस


फ़ौजी, सैनिक, सिपाही
कमांडर, कर्नल, ब्रिगेडियर
हम-आप, हमारे अपने सब पास
हम तो बस छवि ही देखते हैं
बॉर्डर-टैंगो चार्ली जैसी फिल्मों में
कभी ये हमारे नायक बनते हैं
फ़िल्म के नायक के रूप में
कहीं स्टूडेंट्स के रोल मॉडल
कॉलेज के सीरियल के रोल में
पर क्या मिले हम कभी...
उस माँ से जिसका कोखजना
भेजा गया बॉर्डर ड्यूटी पर
पूछा दर्द उस नवबिहाता का
जो हुई सपने और चूड़ियाँ तोड़ने मज़बूर
चढ़ गया जिसका सुहाग आतंकवाद की भेंट
या फिर बात की चुप लगा गए उस पिता से
जिसके जीने की आखिरी उम्मीद
मैडलों और गोलियों से छलनी
भेज दिया गया बक्से में बंद
देश के सम्मान, तिरंगे में लपेट
:
आतंकी हमले होते रहेंगे, शहीद बनते रहेंगे
सत्रह-पचास-सौ तो मात्र संख्या है, देशवासियों
मीडिया-रिपोर्टरों-राजनेताओं के मखोल का
कौन जाने कितने घर उजड़े
कौन गिने कितनी कोख उजड़ी
किसको परवाह कितनी चूड़ियाँ बिखरी
कौन देखे कितनी आस टूटी
घरों में टीवी चैनेलों के आगे
कुछ आक्रोश, कुछ नम आँखें
सड़कों, बाज़ारों, थियेटरों में पर
भीड़ तो कुछ न कम हुई
चल पड़े सब अपने अपने धाम
सच, किसी के लिए
ज़िन्दगी कब-कहाँ रुकी....



देश ने हमें क्या दिया, यह सोच हुई पुरानी..
मैंने देश के लिए क्या किया, यह सोच अब  बनानी

Tuesday, 24 January 2017

मैं परी


अब न बुलाना
फिर उस नाम से
न ही करना फ़ोन
न कोई व्हाट्सअप
न किसी बिचोलिये से भेजना
टूटे तार जोड़ने का कोई सन्देश
टूटे तार और जंग लगी बेड़ियां
सिर्फ लहूलुहान ही करती हैं
जिस्म और रूह को... 
इसलिए देखो तोड़ ही दी मैंने
समय रहते ही
बुज़दिल ज़माने की रिवायतें..
कच्चे धागे से बंधा कसैला रिश्ता.....
हम-तुम से टूट कर हो गए अलग, तुम
अब हूँ सिर्फ मैं..
नीले आकाश में
स्वछंद विचरण करती
मैं परी, नीलपरी...



Friday, 20 January 2017

जिंदगी बनाम व्हाट्सअप


निर्भरता---बेबसी---इंतज़ार
तुम नहीं तुम्हारा ख्याल
घंटों तुम्हारी तस्वीर से बातें
रूठना मनाना रोना
खीजना धमकाना 
पहरों आत्ममंथन
रात के तुम्हारे लास्ट सीन का
ऑनलाइन में परिवर्तन
ऑनलाइन को टाइपिंग होते देख
टकटकी लगा,
क्या लिखना चाह रहे
वही इंतज़ार
पढ़ना, समझना, मुस्कुराना
कहाँ खो जाते हो सारा सारा दिन
रूठने की तर्ज़ पर तुमको सुनाना
आज भी बिज़ी...??
उफ़्फ़्फ़..... चुप्पी...
पेट भी तो भरना मैडम
काम भी तो करना है न
ओके ओके....
करो काम कब मना किया
नहीं करुँगी मैसज अब
जब फ्री हो तुम ही बुलाना
जाती हूँ, मुझे भी बहुत काम
परी हूँ सबको करिश्मों की दरकार
अरे...लड़की...
ओफ्फो.. जैसी तुम्हारी मरज़ी परी
मेरी मरज़ी चली ही कब और कहाँ जनाब
मेरा तो हाल वही
जिंदगी बनाम व्हाट्सएप्प हुए जा रही
निर्भरता---बेबसी---इंतज़ार----प्यार.....
समझे कुछ!!




Sunday, 15 January 2017

मन पतंग

बहती हवा के संग
मैं उड़ चली बादलों के पार
छूने नीला आसमान 
महीन कागज का जामा पहने
हरी, नीली, पीली और लाल
रुपहली सतरंगी पतंग
सबको कहती
देखो मेरी उड़ान
देखो-देखो मैं उड़ चली...।

उड़ चली मैं
इक ऐसे जहान...
जहां न होगा किसी पत्नी को,
अपने शहीद पति के कटे सिर का इंतजार,
न उठानी पड़ेगी किसी अबला को
बन झांसी की रानी, फिर से तलवार,
न होगी सफेद-काले धन की होड़,
न होगा बुद्धिजीवियों के दिलों में आक्रोश,
जहां न उठाएगा मजबूर होकर
कोई नवयुवक बन्दूक
जहां न करना होगा
भ्रष्टाचार का हर समय विरोध
वहां होगा सिर्फ 
अमन-चैन-औ-शांति का साम्राज्य
राम, कृष्ण, नानक और अल्लाह
होंगे सबके आराध्य
वहां होगी हर बच्चे के मुख पर
मासूमियत की मुस्कान
हर दिल में होगा
प्रेम, प्यार, भाईचारा और विश्वास
चला-चला रे मैं उड़ चली
बहती हवा के संग
थाम प्रभु के हाथों की डोर
ले कर अपने मन की
मजबूत पतंग...   

Thursday, 12 January 2017

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ




बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बेटा था घर का सूरज, रोशनी अब आई
घर आँगन चौबारे ज्ञान की ज्योत जलाई

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई


बेटी का पैदा होते ही ले लिया होता दम
सोचो, कहाँ से पैदा हुए होते तुम और हम
वंश बढ़ाएगा क्या बेटा अकेला?
बेटा ही हो, भगवान एक बेटा झोली डालो
ऐसी दुहाई क्यों देते हम सब?

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई

परियों सी होती है बेटी, छुईमुई न बनाना
पढ़ाना लिखाना इसको, स्वावलंबी बनाना
पढ़ गयी जो बेटी, माँ बाबा की शान बढ़ाये
देश का नाम जगभर में ऊंचा करती जाए

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई

टीचर डॉक्टर कलेक्टर पुलिस वकील
क्या क्या बन गई रही आज बेटी
पर्वत खाई समंदर सबको लांघ
नभ के सितारे छू रही है बेटी
हाँ हाँ छू रही है बेटी

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई

घर की आन बान शान है बेटी
माँ पिता का अभिमान बेटी
रानी झांसी मनु भी है बेटी
भारत कोकिला सरोजिनी भी तो बेटी
कल्पना, चंदा, सायना-सानिया देश की बेटियां
अरुंधति भट्टाचार्य भी है बेटी

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई

थोड़ा हाथ तुम बढ़ाओ बेटी के जन्मदाता
थोड़ा साथ देगी देखो यह अपनी सरकार
वर्दी, किताबें, छात्रवृति, बैंक बैलेंस लाडली का
पौष्टिक खाना, आयरन की गोली बाँट रही शिक्षा संग

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई

Tuesday, 10 January 2017

कटी पतंग



परी बन
उड़ जाना चाहती हूँ
नीले-काले-रुई से सफेद
असंख्य बादलों पार
छू लेना चाहती हूँ
नभ की हर बुलंदी,
तारों को तोड़ ला
टांकना चाहती हूँ
तेरी दी नीली-लाल
बंधेज की चुनरी में,
मिलना चाहती हूँ
क्षितिज पार
तुझसे ओ साजन!
पर मिलन की आस लिए
बाट जो जोहती हूँ तेरी
ओ मोरे बिछड़े सनम!
हो जाते सब एहसास क्षीण
और सारे अरमान पस्त
गिर जाती हूँ ओंधे मुँह
पड़ जाती निढाल
कटी पतंग सी मैं,
'नीलपरी'....

Tuesday, 3 January 2017

नया साल


संताप सुनो न
कोहरे वाली सुबह की चूनर से
सुनहरी किरन सब उधड़ी हो जैसे
झुंझलाहट में इज़ाफ़ा करती 
दमकती दुल्हन के भाल की बिंदी
उतार दी निर्मोही नियति ने भरी दुपहरी मानो
आक्रोश बढ़ता सा
जैसे साँझ की सुरंग से निकलती 
धधकती ट्रेन की गूँजती-शोर बढ़ाती सीटी
उदासी ऐसी कि
रात के घनेरे आसमान से
झूमते गाते बच्चों से सब तारे नदारद
सुनो,
गुज़रे हर साल जैसा
नया साल भी तुम जैसा कसैला आया