महकती, मचलती हवा सी वो लड़की
बादलों से मन ही मन बातें वो करती।
फूलों की बन कर वो रानी
तितलियों के पीछे है भागती
सपने सजती, कुछ गुनगुनाती
वो मस्त बहार सी लड़की।
सबकी आंखों में वो रहती
बनकर एक खुशनुमा सपना
छूना जिसे हर भंवरा चाहता
ऐसी है वो महताब सी लड़की।
हर सवाल का जवाब वो दे दे
नैनों के पट अपने अगर वो खोले
फूलों से भी नाजुक वो लड़की
खुली किताब के पन्नों सी लड़की।
बहती ठंडी बयार का झोंका
इक चिराग सी वो लड़की
पानी में लगा दे आग
ऐसी है नादान वो लड़की।
अल्हड़, नासमझ, चंचल है वो
बचपना भरा है रग- रग में उसके
देखती है मीठे सुहाने सपने
पर सपने कब होते हैं अपने।
आशियाँ की ख्वाहिश है करती
रेत के सुन्दर घरौंदे है बनाती
बनाते हुए मन में है सोचती
गर टूटना ही है, हर शय की नियति
क्यूँ बनाती हूँ, मैं रेत के घरौंदे?
क्या नहीं बनेगा मेरा आशियाना
स्नोव्हाइट सी मासूम वो लड़की।
जानती भी है वो, डरती भी है
हर रिश्ता है सिर्फ एक झूठा बंधन
फिर भी मन में ख्वाहिश ये करती
किसी की मीठी यादों में गुमसुम
पिंजरे में बंद वो बुलबुल सी लड़की।
जानती है एक भंवर है ये जीवन
जितना निकलने की कोशिश वो करती
डूबती, उतराती फिर डूबती ही जाती
एक हमसफर का इंतजार है करती
वो जलपरी सी नादान लड़की...
महकती, मचलती हवा सी वो लड़की....

Nice one
ReplyDeleteThnxx 😊
ReplyDeletenice one
ReplyDeleteThnxx Ravinder ji💐💐
ReplyDeleteबहुत खूब....दिल बाग़ बाग़ हो गया👌👌
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