Tuesday, 31 January 2017

तेरी मेरी प्रेम कहानी


इक सुरमयी सर्द सी साँझ
यूँ ही ख्यालों को गूँधती
बेला चमेली की खुशबु में
तेरी महक को तलाशती
यादों के पिटारे से
कुछ मचलते पलों को चुनती
धड़कनों के ताप पर पकाती
तेरे इश्क़ की चांदनी में बहकती
तेरी नज़रों की तपिश से
अपना ही अक्स निहारती
खुद पे इतराती
थोड़ा लज्जाती, थोड़ा शर्माती
यादों वाली तारकों की चुनरी में
कुछ नए एहसास टांकती
मिलन से जुदाई
जुदाई से मिलन के
लम्हों ही लम्हों की
दूरी को नापती
इंतज़ार के स्याह पलों को बाँचती
तुझे सुनाने को गढ़ ही देती हूँ
इक नई प्रेम कहानी
तेरी-मेरी......

Wednesday, 25 January 2017

गणतंत्र दिवस


फ़ौजी, सैनिक, सिपाही
कमांडर, कर्नल, ब्रिगेडियर
हम-आप, हमारे अपने सब पास
हम तो बस छवि ही देखते हैं
बॉर्डर-टैंगो चार्ली जैसी फिल्मों में
कभी ये हमारे नायक बनते हैं
फ़िल्म के नायक के रूप में
कहीं स्टूडेंट्स के रोल मॉडल
कॉलेज के सीरियल के रोल में
पर क्या मिले हम कभी...
उस माँ से जिसका कोखजना
भेजा गया बॉर्डर ड्यूटी पर
पूछा दर्द उस नवबिहाता का
जो हुई सपने और चूड़ियाँ तोड़ने मज़बूर
चढ़ गया जिसका सुहाग आतंकवाद की भेंट
या फिर बात की चुप लगा गए उस पिता से
जिसके जीने की आखिरी उम्मीद
मैडलों और गोलियों से छलनी
भेज दिया गया बक्से में बंद
देश के सम्मान, तिरंगे में लपेट
:
आतंकी हमले होते रहेंगे, शहीद बनते रहेंगे
सत्रह-पचास-सौ तो मात्र संख्या है, देशवासियों
मीडिया-रिपोर्टरों-राजनेताओं के मखोल का
कौन जाने कितने घर उजड़े
कौन गिने कितनी कोख उजड़ी
किसको परवाह कितनी चूड़ियाँ बिखरी
कौन देखे कितनी आस टूटी
घरों में टीवी चैनेलों के आगे
कुछ आक्रोश, कुछ नम आँखें
सड़कों, बाज़ारों, थियेटरों में पर
भीड़ तो कुछ न कम हुई
चल पड़े सब अपने अपने धाम
सच, किसी के लिए
ज़िन्दगी कब-कहाँ रुकी....



देश ने हमें क्या दिया, यह सोच हुई पुरानी..
मैंने देश के लिए क्या किया, यह सोच अब  बनानी

Tuesday, 24 January 2017

मैं परी


अब न बुलाना
फिर उस नाम से
न ही करना फ़ोन
न कोई व्हाट्सअप
न किसी बिचोलिये से भेजना
टूटे तार जोड़ने का कोई सन्देश
टूटे तार और जंग लगी बेड़ियां
सिर्फ लहूलुहान ही करती हैं
जिस्म और रूह को... 
इसलिए देखो तोड़ ही दी मैंने
समय रहते ही
बुज़दिल ज़माने की रिवायतें..
कच्चे धागे से बंधा कसैला रिश्ता.....
हम-तुम से टूट कर हो गए अलग, तुम
अब हूँ सिर्फ मैं..
नीले आकाश में
स्वछंद विचरण करती
मैं परी, नीलपरी...



Friday, 20 January 2017

जिंदगी बनाम व्हाट्सअप


निर्भरता---बेबसी---इंतज़ार
तुम नहीं तुम्हारा ख्याल
घंटों तुम्हारी तस्वीर से बातें
रूठना मनाना रोना
खीजना धमकाना 
पहरों आत्ममंथन
रात के तुम्हारे लास्ट सीन का
ऑनलाइन में परिवर्तन
ऑनलाइन को टाइपिंग होते देख
टकटकी लगा,
क्या लिखना चाह रहे
वही इंतज़ार
पढ़ना, समझना, मुस्कुराना
कहाँ खो जाते हो सारा सारा दिन
रूठने की तर्ज़ पर तुमको सुनाना
आज भी बिज़ी...??
उफ़्फ़्फ़..... चुप्पी...
पेट भी तो भरना मैडम
काम भी तो करना है न
ओके ओके....
करो काम कब मना किया
नहीं करुँगी मैसज अब
जब फ्री हो तुम ही बुलाना
जाती हूँ, मुझे भी बहुत काम
परी हूँ सबको करिश्मों की दरकार
अरे...लड़की...
ओफ्फो.. जैसी तुम्हारी मरज़ी परी
मेरी मरज़ी चली ही कब और कहाँ जनाब
मेरा तो हाल वही
जिंदगी बनाम व्हाट्सएप्प हुए जा रही
निर्भरता---बेबसी---इंतज़ार----प्यार.....
समझे कुछ!!




Sunday, 15 January 2017

मन पतंग

बहती हवा के संग
मैं उड़ चली बादलों के पार
छूने नीला आसमान 
महीन कागज का जामा पहने
हरी, नीली, पीली और लाल
रुपहली सतरंगी पतंग
सबको कहती
देखो मेरी उड़ान
देखो-देखो मैं उड़ चली...।

उड़ चली मैं
इक ऐसे जहान...
जहां न होगा किसी पत्नी को,
अपने शहीद पति के कटे सिर का इंतजार,
न उठानी पड़ेगी किसी अबला को
बन झांसी की रानी, फिर से तलवार,
न होगी सफेद-काले धन की होड़,
न होगा बुद्धिजीवियों के दिलों में आक्रोश,
जहां न उठाएगा मजबूर होकर
कोई नवयुवक बन्दूक
जहां न करना होगा
भ्रष्टाचार का हर समय विरोध
वहां होगा सिर्फ 
अमन-चैन-औ-शांति का साम्राज्य
राम, कृष्ण, नानक और अल्लाह
होंगे सबके आराध्य
वहां होगी हर बच्चे के मुख पर
मासूमियत की मुस्कान
हर दिल में होगा
प्रेम, प्यार, भाईचारा और विश्वास
चला-चला रे मैं उड़ चली
बहती हवा के संग
थाम प्रभु के हाथों की डोर
ले कर अपने मन की
मजबूत पतंग...   

Thursday, 12 January 2017

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ




बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बेटा था घर का सूरज, रोशनी अब आई
घर आँगन चौबारे ज्ञान की ज्योत जलाई

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई


बेटी का पैदा होते ही ले लिया होता दम
सोचो, कहाँ से पैदा हुए होते तुम और हम
वंश बढ़ाएगा क्या बेटा अकेला?
बेटा ही हो, भगवान एक बेटा झोली डालो
ऐसी दुहाई क्यों देते हम सब?

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई

परियों सी होती है बेटी, छुईमुई न बनाना
पढ़ाना लिखाना इसको, स्वावलंबी बनाना
पढ़ गयी जो बेटी, माँ बाबा की शान बढ़ाये
देश का नाम जगभर में ऊंचा करती जाए

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई

टीचर डॉक्टर कलेक्टर पुलिस वकील
क्या क्या बन गई रही आज बेटी
पर्वत खाई समंदर सबको लांघ
नभ के सितारे छू रही है बेटी
हाँ हाँ छू रही है बेटी

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई

घर की आन बान शान है बेटी
माँ पिता का अभिमान बेटी
रानी झांसी मनु भी है बेटी
भारत कोकिला सरोजिनी भी तो बेटी
कल्पना, चंदा, सायना-सानिया देश की बेटियां
अरुंधति भट्टाचार्य भी है बेटी

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई

थोड़ा हाथ तुम बढ़ाओ बेटी के जन्मदाता
थोड़ा साथ देगी देखो यह अपनी सरकार
वर्दी, किताबें, छात्रवृति, बैंक बैलेंस लाडली का
पौष्टिक खाना, आयरन की गोली बाँट रही शिक्षा संग

बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई
बधाई हो बधाई, बेटी घर पर आई

Tuesday, 10 January 2017

कटी पतंग



परी बन
उड़ जाना चाहती हूँ
नीले-काले-रुई से सफेद
असंख्य बादलों पार
छू लेना चाहती हूँ
नभ की हर बुलंदी,
तारों को तोड़ ला
टांकना चाहती हूँ
तेरी दी नीली-लाल
बंधेज की चुनरी में,
मिलना चाहती हूँ
क्षितिज पार
तुझसे ओ साजन!
पर मिलन की आस लिए
बाट जो जोहती हूँ तेरी
ओ मोरे बिछड़े सनम!
हो जाते सब एहसास क्षीण
और सारे अरमान पस्त
गिर जाती हूँ ओंधे मुँह
पड़ जाती निढाल
कटी पतंग सी मैं,
'नीलपरी'....

Tuesday, 3 January 2017

नया साल


संताप सुनो न
कोहरे वाली सुबह की चूनर से
सुनहरी किरन सब उधड़ी हो जैसे
झुंझलाहट में इज़ाफ़ा करती 
दमकती दुल्हन के भाल की बिंदी
उतार दी निर्मोही नियति ने भरी दुपहरी मानो
आक्रोश बढ़ता सा
जैसे साँझ की सुरंग से निकलती 
धधकती ट्रेन की गूँजती-शोर बढ़ाती सीटी
उदासी ऐसी कि
रात के घनेरे आसमान से
झूमते गाते बच्चों से सब तारे नदारद
सुनो,
गुज़रे हर साल जैसा
नया साल भी तुम जैसा कसैला आया