अनुरागी दिल की मधुर पुकार
तुझ पर हों मेरे मन प्राण निसार
मिट कर राग द्वेष निर्मल हो उर
तुम जो पुकार लो इक बार...
मन वीणा के बज उठते सब तार
झूम झूम नाच उठती मस्त बयार
दिल गा उठता फिर-फिर मल्हार
तुम जो हंस दो इक बार...
चन्द्र मुख तेरा मद का प्याला
श्वास श्वास में जीवन भर डाला
निर्झरणी बने ओ साकी हाला
बाँहों में जो ले लो मुझे इक बार...
खुशियों की मस्त फुहार पुष्पित
रोम रोम में मेरे चन्दन सुवासित
मधुशाला सा हिया होगा पुलकित
कचनार का रसपान जो करो इक बार...
मधुर रसमयी हुआ मेरा संसार
स्वर्ग की फिर क्यूँ करूँ दरकार
बन जाओ जो तुम मेरे इक बार
बन जाओ सनम, मेरे, अब की बार...


