परी बन
उड़ जाना चाहती हूँ
नीले-काले-रुई से सफेद
असंख्य बादलों पार
छू लेना चाहती हूँ
नभ की हर बुलंदी,
तारों को तोड़ ला
टांकना चाहती हूँ
तेरी दी नीली-लाल
बंधेज की चुनरी में,
मिलना चाहती हूँ
क्षितिज पार
तुझसे ओ साजन!
पर मिलन की आस लिए
बाट जो जोहती हूँ तेरी
ओ मोरे बिछड़े सनम!
हो जाते सब एहसास क्षीण
और सारे अरमान पस्त
गिर जाती हूँ ओंधे मुँह
पड़ जाती निढाल
कटी पतंग सी मैं,
'नीलपरी'....

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