Friday, 20 January 2017

जिंदगी बनाम व्हाट्सअप


निर्भरता---बेबसी---इंतज़ार
तुम नहीं तुम्हारा ख्याल
घंटों तुम्हारी तस्वीर से बातें
रूठना मनाना रोना
खीजना धमकाना 
पहरों आत्ममंथन
रात के तुम्हारे लास्ट सीन का
ऑनलाइन में परिवर्तन
ऑनलाइन को टाइपिंग होते देख
टकटकी लगा,
क्या लिखना चाह रहे
वही इंतज़ार
पढ़ना, समझना, मुस्कुराना
कहाँ खो जाते हो सारा सारा दिन
रूठने की तर्ज़ पर तुमको सुनाना
आज भी बिज़ी...??
उफ़्फ़्फ़..... चुप्पी...
पेट भी तो भरना मैडम
काम भी तो करना है न
ओके ओके....
करो काम कब मना किया
नहीं करुँगी मैसज अब
जब फ्री हो तुम ही बुलाना
जाती हूँ, मुझे भी बहुत काम
परी हूँ सबको करिश्मों की दरकार
अरे...लड़की...
ओफ्फो.. जैसी तुम्हारी मरज़ी परी
मेरी मरज़ी चली ही कब और कहाँ जनाब
मेरा तो हाल वही
जिंदगी बनाम व्हाट्सएप्प हुए जा रही
निर्भरता---बेबसी---इंतज़ार----प्यार.....
समझे कुछ!!




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