Sunday, 15 January 2017

मन पतंग

बहती हवा के संग
मैं उड़ चली बादलों के पार
छूने नीला आसमान 
महीन कागज का जामा पहने
हरी, नीली, पीली और लाल
रुपहली सतरंगी पतंग
सबको कहती
देखो मेरी उड़ान
देखो-देखो मैं उड़ चली...।

उड़ चली मैं
इक ऐसे जहान...
जहां न होगा किसी पत्नी को,
अपने शहीद पति के कटे सिर का इंतजार,
न उठानी पड़ेगी किसी अबला को
बन झांसी की रानी, फिर से तलवार,
न होगी सफेद-काले धन की होड़,
न होगा बुद्धिजीवियों के दिलों में आक्रोश,
जहां न उठाएगा मजबूर होकर
कोई नवयुवक बन्दूक
जहां न करना होगा
भ्रष्टाचार का हर समय विरोध
वहां होगा सिर्फ 
अमन-चैन-औ-शांति का साम्राज्य
राम, कृष्ण, नानक और अल्लाह
होंगे सबके आराध्य
वहां होगी हर बच्चे के मुख पर
मासूमियत की मुस्कान
हर दिल में होगा
प्रेम, प्यार, भाईचारा और विश्वास
चला-चला रे मैं उड़ चली
बहती हवा के संग
थाम प्रभु के हाथों की डोर
ले कर अपने मन की
मजबूत पतंग...   

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