Sunday, 21 May 2017

चन्ना


आहें जब खलवत से टकराती हैं
नीले अक्सों के साए से
            तेरी तस्वीर उभर कर आती है
अश्कों का साथ लेकर
             यादों की बारात सी बन जाती है
चंद लरजते साये से
             रह रह के दिल को जलाते हैं
           
आहें जब खलवत से टकराती हैं
 मौन के रुंधे गले से
              रुलाई सी फूट जाती है
गालों को छूता, लटों में उलझता
              इक तन्हा सा कजलाया मोती
होठों पे लुढ़कना चाहता है
             ओ बेदर्दी, याद तेरी दिलाता है

आहें जब खलवत से टकराती हैं
हर निशा अमावस सी हो जाती है
           पगलाई सी तारों से बतियाती हूँ
हंसिए सा चन्दा अट्टारी पे
            जिगर के पार उतरना चाहता है
कलेजे को थामे, धड़कन को रोके
           तेरे क़दमों की आहट को तरसती हूँ

ओ चन्ना मेरिया अब तो आजा
     ये तन्हाई नागिन सी, मुझे डसने को आतुर होती है


* खलवत- एकांत
         

         

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