आहें जब खलवत से टकराती हैं
नीले अक्सों के साए से
तेरी तस्वीर उभर कर आती है
अश्कों का साथ लेकर
यादों की बारात सी बन जाती है
चंद लरजते साये से
रह रह के दिल को जलाते हैं
आहें जब खलवत से टकराती हैं
मौन के रुंधे गले से
रुलाई सी फूट जाती है
गालों को छूता, लटों में उलझता
इक तन्हा सा कजलाया मोती
होठों पे लुढ़कना चाहता है
ओ बेदर्दी, याद तेरी दिलाता है
आहें जब खलवत से टकराती हैं
हर निशा अमावस सी हो जाती है
पगलाई सी तारों से बतियाती हूँ
हंसिए सा चन्दा अट्टारी पे
जिगर के पार उतरना चाहता है
कलेजे को थामे, धड़कन को रोके
तेरे क़दमों की आहट को तरसती हूँ
ओ चन्ना मेरिया अब तो आजा
ये तन्हाई नागिन सी, मुझे डसने को आतुर होती है
* खलवत- एकांत
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