न जाने मन में
क्या आई उस रोज़
चाक मिटटी से
बनाते हुए मूरत
बना लिया
सीली मिट्टी का
छोटा सा
घरौंदा भी
सोचा रचाऐंगे
बचपन जैसा
गुड्डा गुड़िया का
ब्याह फिर से...
शायद अब तलक
बचपना था मुझ में
नासमझ थी
नादान भी
छोड़ दिया वो
प्रेम का खिलौना
सुखाने तेज़ धूप...
गमों की चली आंधी
बरखा नीर बहाए
टूट गया
बह गया
सपनों वाले प्रेम का
छोटा सा वो आशियां...
क्या आई उस रोज़
चाक मिटटी से
बनाते हुए मूरत
बना लिया
सीली मिट्टी का
छोटा सा
घरौंदा भी
सोचा रचाऐंगे
बचपन जैसा
गुड्डा गुड़िया का
ब्याह फिर से...
शायद अब तलक
बचपना था मुझ में
नासमझ थी
नादान भी
छोड़ दिया वो
प्रेम का खिलौना
सुखाने तेज़ धूप...
गमों की चली आंधी
बरखा नीर बहाए
टूट गया
बह गया
सपनों वाले प्रेम का
छोटा सा वो आशियां...
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