Wednesday, 24 May 2017

फ़ीनिक्स सी ज़िन्दगी


अज़ाब सी ज़िन्दगी
खा ली,
अपनी उम्र बराबर
प्रोज़ाक की छोटी गोलियां
20 मिलीग्राम की
नींद के आगोश में
शून्य के चरम तक पहुँचने की
फिर एक नाकाम कोशिश
समय को विराम देने की
भरसक जद्दोजहद में
टूटी-बिखरी
बिखर के उलझी
उलझ के सुलझी
कितनी ही बार राख हुई
फिर अपनी ही राख से जी उठी
फ़ीनिक्स सी ज़िन्दगी
क्योंकि वो एक जिस्म नहीं 'नीलपरी'
एक माँ थी..



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