संताप सुनो न
कोहरे वाली सुबह की चूनर से
सुनहरी किरन सब उधड़ी हो जैसे
झुंझलाहट में इज़ाफ़ा करती
दमकती दुल्हन के भाल की बिंदी
उतार दी निर्मोही नियति ने भरी दुपहरी मानो
आक्रोश बढ़ता सा
जैसे साँझ की सुरंग से निकलती
धधकती ट्रेन की गूँजती-शोर बढ़ाती सीटी
उदासी ऐसी कि
रात के घनेरे आसमान से
झूमते गाते बच्चों से सब तारे नदारद
सुनो,
गुज़रे हर साल जैसा
नया साल भी तुम जैसा कसैला आया

Very Exhilarating and appreciable
ReplyDeleteThnxx a lot😊
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