उमड़ घुमड़ ज्यूँ आई घटा
पात पात सब डोल गए
झूम झूम बरसी बरखा
वृंद वृंद खगोल भीगे
धरा का श्रृंगार कुसुम से
बूँद बूँद जलज सरोवर खिले
पादप तरु दल नाच उठे
स्वर की अनगिन लहरियां
बाँवरा मन स्वप्न लिए झूमे
यादों की बगिया में नित प्रति
सोनजुही चंपा बहुरे खिले
आल्हा की सुमधुर तान सुनकर
मन मयूरा थिरकने जो लागे
अधरों पर बिछड़न के गीत
बाँवरी-वितरागिनी तड़पती फिरे
ओ रे सजन, सुन रे मगन
सावन की इस बूँदी बादर पर
ठहर ठहर हर पल तेरी याद पले
![]() |
धरा का श्रृंगार कुसुम से
बूँद बूँद जलज सरोवर खिले
पादप तरु दल नाच उठे
स्वर की अनगिन लहरियां
बाँवरा मन स्वप्न लिए झूमे
यादों की बगिया में नित प्रति
सोनजुही चंपा बहुरे खिले
आल्हा की सुमधुर तान सुनकर
मन मयूरा थिरकने जो लागे
अधरों पर बिछड़न के गीत
बाँवरी-वितरागिनी तड़पती फिरे
ओ रे सजन, सुन रे मगन
सावन की इस बूँदी बादर पर
ठहर ठहर हर पल तेरी याद पले

No comments:
Post a Comment