Wednesday, 14 December 2016

काली घटा

उमड़ घुमड़ ज्यूँ आई घटा   
पात पात सब डोल गए

झूम झूम बरसी बरखा
वृंद वृंद खगोल भीगे
धरा का श्रृंगार कुसुम से
बूँद बूँद जलज सरोवर खिले
पादप तरु दल नाच उठे
स्वर की अनगिन लहरियां
बाँवरा मन स्वप्न लिए झूमे
यादों की बगिया में नित प्रति
सोनजुही चंपा बहुरे खिले
आल्हा की सुमधुर तान सुनकर
मन मयूरा थिरकने जो लागे
अधरों पर बिछड़न के गीत
बाँवरी-वितरागिनी तड़पती फिरे
ओ रे सजन, सुन रे मगन
सावन की इस बूँदी बादर पर
ठहर ठहर हर पल तेरी याद पले




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