Friday, 16 December 2016

बाबुल का आँगन


चाहत नहीं रह गयी कोई
अब बंद दरीचों से आती 
कुम्हलाई सी धूप की
दे दे ओ बाबुल मोरे !
अपने आँगन की फिर वही
कुनकुनी सी धूप मुझे
बगिया के वो बेला, चमेली,
काँटों भरे सतरंगी गुलाब
खाट पर के मूंगफली, रेवड़ी
गिलहरी के झूठे मटर के दाने
मम्मी के फंदों में उलझता बचपन
एनिड ब्लाइटन पढ़, सफ़ेद घोड़े
पर आते जादूगर के हसीं ख्वाब
दिन रात की फाइलों में व्यस्त 
कालेज के मस्ती भरे वो पल
नन्ही परी को मिलता सबका दुलार
कहाँ खो गई यारों,
कागज़ की नाव वाली बरसात
सन्डे स्पेशल मूवी 
मस्त शॉपिंग की बहार
दे दे ओ बाबुल मोरे !
अपने आँगन की फिर वही
कुनकुनी सी धूप मुझे....

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