Wednesday, 14 December 2016

ऋण

सुनो,
ओ अभागे!

हर जन्म
रहोगे ऋणी तुम
अपने फूल से अंश के
छीन जिसके
मुँह का निवाला 
दे आए गैर को,
ऋणी इसलिए भी कि
खुशियाँ जिसके दामन की
दे आये उठाकर गैर को
कैसे चुकाओगे ऋण,
अपनी नन्ही सी कोंपल का
रौंद जिसकी मासूमियत,
अपनी अय्याशी की बली चढ़ा दी
बोतल जिसके दूध की
दारु के नाम होम कर दी
फलने-पनपने की नाज़ुक उम्र में
सपने साकार करने के दौर में
थमा दी, कभी न खत्म होने वाली
लोगों के तानों की लंबी फेहरिस्त
करतूतों के निशाँ तुम्हारे,
कैसे सहता होगा 
कैसे संभालता होगा
माँ का बिलखना बेचारा
हाँ, तुम रहोगे ऋणी
बच्चे के अनसुलझे सवालों के,
लेना होगा जन्म तुम्हें फिर-फिर
एक एक अश्रु को झेलना होगा
काँटों भरी राह पर चलना होगा
धूप, आंधी, तूफ़ान, बरसात
अकेले, निर्वत्र, नंगे पाँव
सहना होगा नासूर बना,
इक इक ज़ख़्म उसका
अभागे हो तुम
भूल चूका तुम्हारा एहसास
पर न भूला, ना भूलेगा
खुद पर, माँ पर, तुम्हारा अत्याचार
अब वो नन्हा पौधा नहीं
पनप चला माँ के प्रेम की धूप में
अपनों के नेह की छाँव तले
मुरझाने से पहले थाम उसका हाथ, 
साईं ने बना लिया अपना लाल
लेगा इक दिन बदला,
माँ के अपमान का 
सुनो ओ अभागे!
ले लो चाहे सौ जन्म
फिर भी न धुलेगा रूह से पाप
फिर भी न उतरेगा
अभागे पिता के सर से
अबोध बेटे का
ऋण.........

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