देख रही थी,
अपलक शून्य में,
स्वर लहरी सी
फैली थी, फिजा में
फूलों में बैठी
फूलकुमारी सी 'वो'
गुम थी
मग्न थी
अपनी ही धुन में
अपनी लगन में
दुनिया की भीड़ से
बेगानी, बेखबर
श्वेत-श्याम-रंगीन फेर से
कोरी, निपट, अनजान
कमसिन मुस्कान अधर लिए
छेड़ रही वीणा पे
वीनावादिनी बन
कुछ अनछुए एहसास
चमक रही शाने पे
तुहिन सी कुछ बूँदें
अपलक दूर तक निहारती
कमसिन मुस्कान अधर लिए
छेड़ रही वीणा पे
वीनावादिनी बन
कुछ अनछुए एहसास
चमक रही शाने पे
तुहिन सी कुछ बूँदें
अपलक दूर तक निहारती
जैसे जोह रही पी की बाट
मधुर गीतों से पुकार रही
उस अनदेखे बलम को
कौन जाने पीर विहरन की
जिसे न भेद हो कोई
बसंत, पतझड़ या सावन का
जन्मों से प्यासी धरा सी
कान्हा की मीरा सम थी
कमल नयनों वाली
नैनसुखिया..!!!!
नैनसुखिया..!!!!

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