दहकती आग हर ओर बरस रही
सूरज की गरमी बढ़ते ही
धरा लाल अंगारे देखो उगल रही
सड़कों किनारे बिखरे हज़ारों पलाश
जिनकी लाली से, वसुंधरा सज रही
गुलाब हो तो गुलदान की शोभा बनें
यही सोच तो दिल को भी सुलगा रही
न गोरी का श्रृंगार बनें कभी हम
न पूजा थाल में ही देवी हमें सजा रही
महक भी कोई ख़ास नहीं पाई, तभी तो
न भौरों का गुंजन, न तितली मंडरा रही
क्यों है हताश, ओ रे तू पलाश!
रूप ही शान नहीं, हे जीवनदायनी ब्रह्मवृक्ष
गुण ही जीवन सम्पदा, ये समझ आ रही
ओ मद-मस्त मानव अभिमानी
समझ तुमको भी क्या ये कहानी आ रही

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