Tuesday, 13 December 2016

मेरी साहिबा


आज यूँ ही इक पल

हंसी-ठिठोली-मस्ती में
पूछ जो बैठी उनसे
जब तुम दूर जाओगे
क्या तुम हमको
भूल जाओगे, 

बोलो..
ओ साजन!!
पर्वतों पे निकली
उषा की पहली
सौंदर्य-किरण हो तुम
फूलों की बगिया में उड़ती
सोन-चिरैया, तितली हो तुम
साँझ के मलिन चेहरे पे
मादकता की लाली सी तुम
रात के आँचल पे
तारकदल संग छिटकी
निर्मल चांदनी हो तुम
कायनात का आदि तुम
सृष्टि का अंत भी तुम हो
भूलूँ जो जिस दिन तुमको
रूह से जिस्म का मेरे
बंधन कैसे न टूट जाएगा
बोलो?
सुन रही हो न, ओ परी!
मेरी साहिबा 'नीलपरी'!!!!!

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