कुनकुनी धूप
कतरा कतरा प्रेम
छन-छन के आ रहा
बंद दरीचों से....
सोचा,
दिल के कपाट खोल
पलकों को मूँद
समेट लूँ तेरे सारे अहसास
ओढ़ लूँ यादों का नर्म कम्बल
माना
मौसम ने ली है फिर करवट
खिली हुई तेरे प्यार से लबरेज़
मय की छलकती प्याली सी
कुनकुनी सुनहरी धूप.........!
No comments:
Post a Comment