Friday, 16 December 2016

बालकनी


सच  बहुत फर्क है
इस बालकनी
और
उस बालकनी में
खुला आकाश
ख्वाहिशों का अम्बार
अनंत संभावनाएं
सुनहली धूप से
सुनहरे ख्वाब
उन ख्वाबों को
हकीकत में तब्दील करने की
नीचे खेलते बच्चों सी ज़िद
बरखा की झिलमिल फुहार
फूलों पर नित भौरों की गुंजार
मन भी पंछी-तितली सा
मस्त उड़ान भरने को तैयार
बालकनी तो थी वहां भी
पर सख्त हरी ऑःनिंग तनी थी
सूरज भी तरसता था
रूह को रिझाने को
बरखा भी बस दूर से
झलक दिखलाती थी
फूल खिलते नहीं, बस
ठूँठ चुभन देते थे
ख़्वाब तो तुलसी की तरह
बिलखते-मुरझाते थे
घुटन थी वहाँ दहशत की
बच्चे भी सड़क पर आने से डरते थे
ख़ौफ़ज़दा था वहां का मौसम
तभी तो छोड़ आई हूँ
वो हैवानियत भरा
ईंट-गारों- सीमेंट का बना
पत्थर दिल वालों का मकान
आ गई हूँ दरिंदों से दूर
अनचाहे रिश्तों की ख़लिश से परे,
बनाया है अपना सुन्दर आशियाँ
सुकून-शान्ति का अब है समा
अपनों के बीच मुस्काती हूँ
खोज रही हूँ नित-प्रति
अपनों के दिल में,
अपनी ही नज़रों में,
अपनी खोयी पहचान....
सच बहुत फर्क है
उस बालकनी
और
इस बालकनी में...




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