खुला आकाश
ख्वाहिशों का अम्बार
अनंत संभावनाएं
सुनहली धूप से
सुनहरे ख्वाब
उन ख्वाबों को
हकीकत में तब्दील करने की
नीचे खेलते बच्चों सी ज़िद
बरखा की झिलमिल फुहार
फूलों पर नित भौरों की गुंजार
मन भी पंछी-तितली सा
मस्त उड़ान भरने को तैयार
ख्वाहिशों का अम्बार
अनंत संभावनाएं
सुनहली धूप से
सुनहरे ख्वाब
उन ख्वाबों को
हकीकत में तब्दील करने की
नीचे खेलते बच्चों सी ज़िद
बरखा की झिलमिल फुहार
फूलों पर नित भौरों की गुंजार
मन भी पंछी-तितली सा
मस्त उड़ान भरने को तैयार
बालकनी तो थी वहां भी
पर सख्त हरी ऑःनिंग तनी थी
सूरज भी तरसता था
रूह को रिझाने को
बरखा भी बस दूर से
झलक दिखलाती थी
फूल खिलते नहीं, बस
ठूँठ चुभन देते थे
ख़्वाब तो तुलसी की तरह
बिलखते-मुरझाते थे
घुटन थी वहाँ दहशत की
बच्चे भी सड़क पर आने से डरते थे
ख़ौफ़ज़दा था वहां का मौसम
पर सख्त हरी ऑःनिंग तनी थी
सूरज भी तरसता था
रूह को रिझाने को
बरखा भी बस दूर से
झलक दिखलाती थी
फूल खिलते नहीं, बस
ठूँठ चुभन देते थे
ख़्वाब तो तुलसी की तरह
बिलखते-मुरझाते थे
घुटन थी वहाँ दहशत की
बच्चे भी सड़क पर आने से डरते थे
ख़ौफ़ज़दा था वहां का मौसम
तभी तो छोड़ आई हूँ
वो हैवानियत भरा
ईंट-गारों- सीमेंट का बना
पत्थर दिल वालों का मकान
आ गई हूँ दरिंदों से दूर
अनचाहे रिश्तों की ख़लिश से परे,
बनाया है अपना सुन्दर आशियाँ
सुकून-शान्ति का अब है समा
अपनों के बीच मुस्काती हूँ
खोज रही हूँ नित-प्रति
अपनों के दिल में,
अपनी ही नज़रों में,
अपनी खोयी पहचान....
वो हैवानियत भरा
ईंट-गारों- सीमेंट का बना
पत्थर दिल वालों का मकान
आ गई हूँ दरिंदों से दूर
अनचाहे रिश्तों की ख़लिश से परे,
बनाया है अपना सुन्दर आशियाँ
सुकून-शान्ति का अब है समा
अपनों के बीच मुस्काती हूँ
खोज रही हूँ नित-प्रति
अपनों के दिल में,
अपनी ही नज़रों में,
अपनी खोयी पहचान....
सच बहुत फर्क है
उस बालकनी
और
इस बालकनी में...
उस बालकनी
और
इस बालकनी में...
No comments:
Post a Comment