Friday, 16 December 2016

माँ का फ़र्ज़



गम  की आंधियां
दर्द के सर्द गर्म थपेड़े
जख्मों की सुनामी
यादों का भूकंप
प्रेम का ठंडा
जमा लावा भी...
:
:
देख ली
सह ली
सबकी बेरुखी भी...
:
:
टूटी कई बार
बिखरे भरोसे के
हरे लाल मनके भी
सिमटी फिर फिर
उठ खड़ी हुई
अटल हिमालय सी
दिखती थी जो
चुलबुली चंचल
वो नार अलबेली
देख सामने खड़ा
वो अपना ध्येय
सजग थी
लेकर मन में
बस एक ही लक्ष्य...
माँ का फ़र्ज़..!





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