कच्ची ईंट के बने
महलों को
संग ही दुनियावी
रिवायतों को
बेड़ियों में जकड़े सामाजिक
आडम्बरों को
लात मार के उठ खड़ी होती है
बचाये अपने स्वाभिमान को
किसी अन्धड़,किसी सुनामी
किसी भूचाल से अब नहीं डरती वो
महल, जहाँ गूंजती थी दर्द भरी आहें
शराब के नशे में मदमाते
फिंके बर्तनों से दागदार थी दीवारें
अत्याचारी-व्याभिचारी की
मार से छलनी थे, जिस्म-ओ-जान
भूल अपना अपमान,
कोखजाए की खोई मुस्कान,
तिनका तिनका जोड़
बना ही लिया,
दृढ़संकल्पी स्नोवाइट ने
प्रभु की नेमतों वाला
अपना घरौंदा
नेमप्लेट पर लिखा जिसके
चमचमाते अक्षरों में
उसका अपना ही नाम....

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