थोड़ी हठीली, सजीली, थोड़ी शर्मीली
हरपल ऊँची उड़ान के ख्वाब सहेजती
सजती, संवरती, दर्पण छवि निहारती
अपने ही अक्स पर खुद ही वो रीझती
कभी रूठती, चिल्लाती, कभी चरमराती
मिल जाएंगी, हम पैंतीस साला औरतें
रातभर निशाचर बनी, कभी झपकी लेती
लैपटॉप पर ऑफिसवर्क से माथा मारती
मुर्गे की बांग का कभी न इंतज़ार करती
चारों बर्नर पर दाल, सब्ज़ी, दूध, रोटी
थोड़ा सा प्यार, थोड़ा खीज मिला पकाती
हर घर में हैं, हमसी पैंतीस साला औरतें
बड़ी बिटिया की चोटी गूंधति
छोटे मुन्ने की नैप्पी बांधती
एक हाथ में हब्बी का टिफिन
एक में बिटिया का स्कूल बैग
बस स्टैंड पर नाईट सूट में भागती
दिख जाएंगी, हम पैंतीस साला औरतें
चकरघिनि सी घूमती, बैग संभालती
मेट्रो की क्यू में, सबसे झगड़ती
दौड़ती, हांफती, भागती, एस्कलेटर लपकती
स्टाफ की घूरती आँखों से अपने
कमर के गिर्द बढ़ते टायरों को छुपाती
बॉस के केबिन डरती, हम पैंतीस साला औरतें
बैग को ही बना, सब्ज़ी-भाजी का थैला
दूध, ब्रेड, चॉकलेट, आइसक्रीम खरीदती
फिर किचन की गर्मी में झुलसती, भुनभुनाती
ले आई टेबल पर, डिनर, हरेक की पसंद का
बच्चों की मॉम, पति की भोग्या, भूल गयी
है इक इंसान भी, हम पैंतीस साला औरतें
माँ, बहन ,बेटी, सखी और सहचरी, कितने रूप धरें
कभी थकती नहीं खुद में, हम पैंतीस साला औरतें

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