Wednesday, 14 December 2016

सैंड कोलाज

सुनो!
कभी होती थी जो तनहा
निकल जाती थी चलते चलते
वहीँ सागर किनारे
बैठ यादों की सीली रेत पे
तेरा नाम लिखती थी
इक मौज आती थी
इक मौज जाती थी
मिटा देती थी
तेरे नाम का और
हमारे शाश्वत प्रेम का
एक एक हर्फ़...
और मैं...
दीवानी सी
बांवरी सी
'नीलपरी'...
फिर फिर सजाती थी
तेरी यादों का समां
तेरा नाम लिख लिख...
देखो!
आज जब
तेरी यादों की महक
ले गयी मुझे फिर
उसी सागर तट पर
लिखा तेरा नाम रेत पर
और जब तक तेरे नाम को,
तेरे अक्स को
एक लहर मिटाती...
भर लिया उसे अंजुरी में
और कर लायी बंद
ज़िप-पाउच में, घर तलक
रंग दिया सीली रेत को
प्रेम से सराबोर रंगरेज़ की माफ़िक
तेरी यादों के सतरंगी रंगों में
बना कर अपने जज्बातों का
एक सुन्दर सैंड कोलाज
सजा दिया
कमरे की बड़ी दीवार पर
प्रभु की प्रतिमा की बगल में
ऐन लैंप शेड के नीचे...
रंग गयी मेरी ज़िन्दगी
तेरे प्रेम के रंग से
देखो न!
अब हर दिन रंगीला
हर लम्हा
तेरी यादों की होली......!!!!!


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