Friday, 30 December 2016

प्रेम

हाँ !
मैंने देखा है
एक नहीं, अनेकों बार
प्रेम के शाश्वत रूप को
पंखुरी पर निशा की आँख के
मोती सा चमकते हुए, भोर में

क्षितिज के इस पार
से उस पार सप्त रंगों के
धनुष सा झूलते हुए
आसमां से बरसती बूंदों में
सिसकता प्रेम ही तो है
और ऊँची अट्टालिकाओं के
बंद अंधेरों में घुटता, दम तोड़ता
हुआ प्रेम भी
मैंने देखा है.....
क्या तुमने देखा?
महसूस किया प्रेम के अहसास को?
शब्दों से परे भावनाओं के खेल को?
नहीं न?
क्यूंकि मृतकाय पाषाण में नहीं...
बचपन की मुस्कान में गोचर है.....

प्रेम.......!!!!!




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