हाँ तुम वही हो
एक ज़माना पहले
जो इन मतवाली आँखों की
मस्ती में डूबा
तो फिर उबर न सका
हाँ तुम वही हो
जिसे यह मजनू
किस ज़माने से
चाह कर भी
पा न सका
मेरी लैला
मेरी मेहबूब
मेरे ख्वाबों की कली
तुम वही हो
जिसकी नीली शाल की नरमी
मेरे अंतस को गरमाती है,
आज भी
जिसकी नीली चुनरी की
भीनी सी खुशबू
मेरी साँसों को महकाती है,
आज भी
तो वो शक्स क्यों
सच्चा लगता है
क्यों उसका यह सब कहना
अच्छा लगता है
क्यों आज भी उसकी बातों पर
यकीन सा होने लगता है
क्यों वो शख्स उसे
अपना सा लगता है
बोलो, बोलो न...!


No comments:
Post a Comment