Friday, 16 December 2016

कविता

घर की ड्योढ़ी से निकलते ही
गली, कूँचों, बाजार से होते हुए
भावनाओं के फूल चुनते हुए
बन जाती है कविता
माँ का दुलार, पिता की फटकार
दोस्तों संग मस्ती, हंसी-ठिठोली
प्रेम के अहसास गुनते हुए
बन जाती है कविता
कुछ आहें, कुछ सिसकियाँ
कुछ लाज, कुछ मनुहार
आंसुओं के ताने-बाने बुनते हुए
बन जाती है कविता
कभी बचपन की कागज़ की कश्ती
रूह से रूह का मिलन, कभी जुदाई
कभी पत्तों पर लिखी ओस की आयत
बन जाती है कविता
कुछ वीर रस, कुछ हास्य रस
कुछ छंद, माटी की सुगंध
देश-काल-समय की सीमा में बंधते हुए
बन जाती है कविता


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