तेरे एहसासों के
गुनगुने ताप से
स्वतः वाष्पित हो,
तुझमें समा जाऊँ..
ओस की बूँद
मैं तेरी कहलाऊं..
ओ मेरे सूरज!!
मौसम ने करवट बदली,
इश्क़ की रुत है आई,
चमक से तेरी
रूप अपना दमकाऊँ
ओ मेरे सूरज..!!
कभी जो सोचूं
अतीत की यादों में,
मतवाली हो, खो जाऊँ..
ओस की इन बूंदों पर
सुनहली इबारतें जो लिख पाऊँ,
बन जाता है इंद्रधनुष
और खिल जाता है
'नीलपरी' का सप्तरंगी आसमान
ओ मेरे सूरज..!!
Friday, 16 December 2016
मैं और तुम
मैं और तुम बराबर हम कभी तो ये फ़लसफ़ा समझोगे कभी तो मौन को मेरे, तुम पढ़ोगे कभी तो रोष में दबे आँसू पहचानोगे कभी तो एक होंगे सब फैसले हमारे कभी तो गलतफहमियों का कुहांसा छटेगा कभी तो आएगा ठहराव ज़िन्दगी में कभी तो, हाँ कभी....
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