नहीं होते जब पास तुम
घिर जाती हूँ संताप से
ढूंढती हूँ तुम्हें
बाँवरी बन डोलती हूँ
यादों के बियाबान में
गूंजती है तुम्हारी बानी
दिल की वादी में
कायनात की हर शै में
पर कितना ढूँढूँ
मिलते ही तो नहीं हो,
जानम तुम अब कहीं...
छटपटाती हूँ
मुरझा जाती हूँ
याद आते हैं फिर तुम्हारे बोल
चिल! यू आर माइन!
क्यों हो बेचैन
पास ही तो हूँ...
खोजती हूँ फिर अंतस में
पाती हूँ तुम्हारा ही अक्स
अपनी भीतर ही
समाये हो कस्तूरी बन
मेरी हर सांस में,
धड़कन में
सुबह की धूप में तुम
साँझ छाँव बन तुम ही
मेरे, ओ! मेरे...

बहुत खूब!...सुन्दर अहसास!
ReplyDeleteबहुत खूब!...सुन्दर अहसास!
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार😊
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