Friday, 16 December 2016

बेज़ुबान ताली




कोई पागल है शायद
लोग सोचते ही होंगे निःसंदेह
जब पास नहीं दिखता कोई
तो किसको बुला रही
यूँ रह रह के बार बार
थकती भी नहीं क्या
बांवरी हाथ हिला हिला ....

हाँ थक ही तो गयी हूँ अब

एकतरफा प्यार जो किया तुमसे
हाँ थक ही तो गयी हूँ अब
यूँ एक तरफ़ा संवाद करके
हाँ थक ही तो गयी हूँ अब
एक हाथ से ताली बजाते बजाते
ताली जो सब देखने वालों को तो
किसी को पास बुलाती सी लगती है
पर तोड़ नहीं पाती तुम्हारी तन्मयता
आकृष्ट भी नहीं करती तुम्हारा ध्यान
क्यूंकि कोई मेनका नहीं
बस कुछ प्रेम भरे एहसास लिए है
मेरी एक हाथ से बजती
ये मूक, मासूम, बेज़ुबान ताली.....!!!

2 comments:

  1. अति सुंदर, दिल को छू लेने वाला लेखन । मुझे आस ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आपका ये ब्लॉग इस क्षेत्र में एक नए आयाम को छुयेगा । ईश्वर आपको एक नयी राह, नया उल्लास और एक अपनी अलग पहचान पाने की दिशा में जोरदार कामयाबी दे..ह्रदय से बहुत सारी बधाईयां॥

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  2. कुमार जी दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आपकी जो आपने सिर्फ रचना ही नहीं पढ़ी वरन ब्लॉग और जीवन के लिए शुभकामनायें भी दी, बहुत बहुत आभार कुमार बिन्दास जी 😇

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